सब कुशल मंगल यहाँ पे, बात इतनी सि है बस।
सिंहनी का खून है, कैसे हुआ इतना बेबस।
तेरे ही तो शौर्य से अब मैं सजती सँवरती हु।
फौज़ में है मेरा बेटा गर्व से मैं कहती हुँ।
अब ज़माने को मैं जाके क्या मुँह दिखलाऊँगी
बेटा गर तू डर गया मैं जीते जी मर जाऊंगी।
दुश्मन की टोली में जा, और जा कर संघार कर।
गीदड़ों की भीड़ में तू सिंह की हुंकार कर।
काल हो आँखो में तेरी शत्रुओं पर वार कर।
दुश्मनों की भूमि पर जय हिन्द का जयकार कर।
जो शत्रुओं से हो घिरा तो मृत्यु से टंकार कर।
काल हो जो सामने तो रूप को विक्राल कर।
दुश्मनों की वह धरा न हो रक्त से विहीन।
शत्रुओं के ख़ून से तू उस धरा को लाल कर
जीत कर जो आया तो फिर दूध से नहलाऊंगी।
और अपने हाथ से हलवा पूरी खिलाऊंगी।
जो तू लिपट आया तिरंगे, गर्व से भर जाऊंगी।
मातृ भू का ऋण चुकाने छोटे को भिजवाऊंगी।


