वीर पुत्र थे भारत माँ के जाने कहाँ से आए थे।
संग अपने वो रंग बसंती चोला भी ले आए थे।
आज नमन फिर करकर उनको श्रद्धा सुमन चढ़ाऊंगा।
सबकी अजर अमर बलिदानी मैं तुमको बतलाऊंगा
एक शूरवीर थे, भारत माँ के गोरों के प्रतिकारी थे।
सेना समान, एक निष्ठावान,वो सौ सिंघो पे भारी थे।
आज़ादी का प्रण लेकर वो जब बिस्मिल से जा मिले।
हिन्द देश की क्रांति गुलशन में सुनहरे फूल खिले।
पर बिस्मिल का साथ पाना इतना भी आसान न था।
किन्तु पंडित के जज़्बे का बिस्मिल को अनुमान था।
एक परीक्षा ली बिस्मिल ने पूछा क्या कर सकते हो।
क्या क्रान्ति की बलिबेदी पर फाँसी भी चढ़ सकते हो।
हाथ रखा लौ पर शेखर ने और बिस्मिल को वचन दिया।
आज़ादी पर मर मिटने का उनको आश्वासन दिया।
आज़ादी के इस जज़्बे पर बिस्मिल भी भाव विभोर हुए।
गले लगाया शेखर को फिर दोनों दो से एक हुए।
फिर धूम मचादी क्रांति की आज़ादी के परवानों ने।
काकोरी में सब लूट लिया दीवानों ने मस्तानों ने।
इस घटना के तुरंत बाद अंग्रेज भी अब क्रुद्ध हुए।
और अदालत के फ़ैसले भी इनके विरुद्ध हुए।
न्यायाधीश ने एकपल में इनको फाँसी फ़रमान दिया।
बिस्मिल,अशफाक,ठाकुर और लाहिड़ी ने अपना अमर बलिदान दिया।
वो जो थे आज़ाद हमेशा,आजीवन आज़ाद रहे।
अंग्रेजों की चंगुल से भागे और जिंदाबाद रहे।
एक वीर थे भगतसिंह भी, स्वतंत्रता सेनानी थे।
आज़ादी के जज़्बे में भी वो शेखर के सानी थे।
जे पी सांडर्स को मारा था लाला जी के बदले में।
जिनको सांडर्स ने मार था लाठी चार्ज के हमलें में।
पहली गोली मारी गुरू ने सांडर्स जमीं पे जा गिरा।
फिर भगत ने 6 गोली से सांडर्स का संघार किया।
और भागते हुए उन्हें जब अंगरक्षक ने देख लिया।
पलक छपकते ही शेखर ने उसका माथा भेद दिया।
क्रांतिकारियों के इस क़दम को भारत ने स्वीकारा था।
लाला जी का बदला लेने पर सबको सराहा था।
लेकिन अब तक अंग्रेजों को बात समझ न आई थी।
उनके ही अंदाज़ में फिर उनको आवाज़ सुनाई थी।
बम फोड़कर बीच अदालत एक हुँकार लगाई थी।
सोई अंग्रेजी शाशन की भी नींदे उड़ाई थी।
स्वयं चाहकर वीरों ने फिर ख़ुदको ही गिरफ्तार करा।
और क्रांति का न्यायालय में भी खूब प्रचार करा।
गए जेल में तो जेल तंत्र से भी जा भिड़े।
वहाँ क़ैद में भरे कैदियों के हक के लिए लड़े।
64 दिन तक भूक हड़ताल की,और खाने का बहिष्कार किया।
एक और क्रांतिवीर ने फिर इसमें अपना जीवन वार दिया।
शहीद हुए यतीन्द्रनाथ और जीवन का बलिदान दिया।
फिर हुकूमत ने जेल में अच्छा खान पान किया।
लिखी खुली चिट्ठी थापर ने गाँधी के आदर्शों पर।
पूछें कुछ गंभीर प्रश्न गांधी, इरविन समझौते पर।
फिर जिस फैसले का डर था, फिर से वही एलान हुआ।
और मृतुआलय से फिर से फाँसी फरमान हुआ।
दोबारा ये फ़रमान जानकर वीर शेखर अचंभित थे।
वो तो थे आज़ाद मगर मित्रों के लिए चिंतित थे।
एक आशा लेकर के वह फिर नेहरूजी के पास गए।
गांधीजी को बोल फाँसी रुकवाने की लेकर आस गए।
वैचारिक मतभेदों में लेकिन फिर दोनों उलझ गए।
नेहरू से कुछ न होगा एक पल में शेखर समझ गए।
फिर अल्फ्रेडो पार्क में जाकर एक मित्र का इंतजार किया।
इतने में अंग्रेजी कुत्तों ने घेर शेर पर वार किया।
अचूक निशाना था पंडित का अर्जुन का अवतारी था।
अंग्रेजी सेना के ऊपर एक अकेला भारी था।
जबतक थी गोली हाथ में एक एक को मार दिया।
फिर आख़री गोली से खुदही अपना जीवन त्याग दिया।
अंग्रेजी सेना के कायर सैनिक शेखर से डरते थे।
तलवे पर गोली मार मारकर मृत्यु सुनिश्चित करते थे।
हिम्मत करके एक गोरा फिर मृत शेखर की ओर बढ़ा।
और अचंभित होकरके हुआ उनसे दूर खड़ा।
स्वयं प्राण त्यागे शेखर ये तस्वीर बताती थी।
चेहरे पर मुस्कान सजी थी, हाथ में हिन्द की माटी थी।
वो जो थे आज़ाद हमेशा मरकर भी आज़ाद रहे।
आज़ादी की बलिबेदी पर चढ़कर जिंदाबाद रहे।
इधर भगत की फाँसी का दिन भी आने वाला था।
पर अंग्रेज ये जानते थे कि बब्बर शेर से पाला था।
उन्हें पता था हिन्द देश को फाँसी सहन नही होगी।
ऐसे यह कुर्बानी देश हो हज़म नहीं होगी।
रचा एक षड्यंत्र और अपने हित ये काम किया।
फाँसी से दो दिन पहले फाँसी का इंतजाम किया।
दी सूचना जेलर ने जब 23 मार्च को फाँसी की।
इठला कर बोले सुखदेव भैया बहुत देर कर दी।
हमारी फाँसी से देश का इंक़लाब जग जायेगा।
हमारे बाद क्रांति पर मरने जनसैलाब आएगा।
और गले मिलकर तीनों फाँसी तख़्ते की ओर बढ़े।
मानो उनकी राहों में हो श्रद्धा सुमन फूल चढ़े।
फाँसी का तख्ता भी अपनी ही किस्मत पर रोता थ।
और गले का फंदा मानो अपने पाप धोता था।
वो रंग बसंती चोला गा कर तीनो शान से झूल गए।
चरखे से आज़ादी आयी हम कहकर कुर्बानी भूल गए।
इस वीर त्रिमूर्ति की गाथा जीवनभर सबको सुनाएंगे
हम ऋणी हैं शहीद-ए-आज़म के जीवन भर सूद चुकाएंगे।