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राजनीति

सबने आस लगाई थी बारी बारी सरकारों से। अब शायद मुक्ति मिलेगी चरमपंथ के नारों से। शायद चीख सुनी जाएगी संसद के गलियारों से। किंतु हम उम्मीद लगा बैठे थे भेड़ सियारों से। जबतक आग नहीं बुझती है बूँदों से बौछारों से। मेरी कविता द्वंद्व करेगी शोलों से अंगारों से।   मंदिर मस्जिद गाय के पीछे झुलस रहा है सारा देश। दिल्ली गूँगी बहरी हो गई भभक रहा उत्तर प्रदेश। कोई बात नही करता है, धरतीपुत्र किसानों की। संसद में भी बात
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