सबने आस लगाई थी बारी बारी सरकारों से। अब शायद मुक्ति मिलेगी चरमपंथ के नारों से। शायद चीख सुनी जाएगी संसद के गलियारों से। किंतु हम उम्मीद लगा बैठे थे भेड़ सियारों से। जबतक आग नहीं बुझती है बूँदों से बौछारों से। मेरी कविता द्वंद्व करेगी शोलों से अंगारों से।   मंदिर मस्जिद गाय के पीछे झुलस रहा है सारा देश। दिल्ली गूँगी बहरी हो गई भभक रहा उत्तर प्रदेश। कोई बात नही करता है, धरतीपुत्र किसानों की। संसद में भी बात नही होती हैं वीर जवानों की। मै दिनकर का वंशज हुँ मैं गीत राष्ट्र के गाऊंगा। हर पंक्ति हर मिसरे में जय भारत माँ चिल्लाऊंगा।   सबकी  आँखों  में  आँसू है  सीने  में  चिंगारी  है। राजनीति ने फिर से भारत माँ को ठोकर मारी है। युवाओं आह्वान सुनों और जंग का एलान करो। अपनी तीसरी आँख को खोलो, कलयुग का विषपान करो। मैं अभागा एक चिराग हुँ, बस कुछ दिन जल पाऊँगा। लेकिन जबतक लौ ज़िन्दा है, उजियारा फैलाऊंगा।