राज़ किसी को बताना नही।
आग है इसको बुझाना नही।
फ़ोन उसका आएगा तो सही।
फोन अब उसका उठाना नही।
मंज़िलो को चाहता हुँ फ़क़त।
रस्ते का पत्थर हटाना नही।
लौट कर वो भी यहीं आएगा।
पीछे से उसको बुलाना नही।
लोग सब डर जाएंगे देखकर।
हर शहर शीशा दिखाना नही।
ये शहर ख़ामोश है पर क्यू।
इस शहर कोई दीवाना नही।
बातें तो उसको बतानी हि हैं।
बातें पर उसको बताना नही।
लोग सब एक जैसे होते नही।
हर किसी को आज़माना नही।
-अमूल्य मिश्रा