मैं निहत्था खड़ा यहाँ, नैनों के तीर चलाए कौन।
नींद बहुत हैं आखों में पर मुझको गीत सुनाए कौन।
अक्सर रूठ जाता हुँ क्योंकि तुम मुझे मनाती हो।
आँखो में सागर भर कर के प्रेम सुधा बरसाती हो।
चाँद सितारे बात तुम्हारी अक्सर करते रहते हैं।
खिड़की बिस्तर घर दरवाज़े तेरे रस्ते तकते हैं।
तुम जबसे रूठी हो तो ये जग भी सूना लगता है।
लौट के वापस आ जाओ अब मुश्किल जीना लगता है।
साँसों की चिंगारी को भड़का के आग बनाए कौन।
नींद बहुत हैं आखों में पर मुझको गीत सुनाए कौन।