हादसा
कभी ठहरे हुये पानी को देखो
तो उसमें एक पत्थर मार देना
कोई भी शै मुझे ठहरी हुयी अच्छी नहीं लगती
तुम्हारे साथ गुज़रे वक़्त पर अटका है मेरा वक़्त
तुम्हारे साथ गुज़रे वक़्त के अवशेष रक्खे हैं
कभी मौका मिले तो आके ये अवशेष ले जाना
मुझे ठहरा हुआ ये वक़्त भी अच्छा नहीं लगता
कोई भी शै मुझे....
कहीं से तो कोई उम्मीद आये
कहीं से तो लगे मैं जी रहा हूँ
मुझे थोड़े बहुत अच्छे से हद दर्जे की नफ़रत है
ये जो थोड़ा बहुत अच्छा है ये अच्छा नही होता
कोई अच्छी बुरी कैसी भी हो कोई ख़बर तो हो
मैं अब इक हादसे का मुन्तज़िर हूँ,
मुझे ठहरी हुयी ये ज़िन्दगी अच्छी नहीं लगती
- अमूल्य मिश्रा/Amulya Mishra
