तू कविता है अंतर्मन की

तेरा क्या उल्लेख करूँ

 

भूरी आँखे गाल गुलाबी

सोने के जैसे हैं बाल

कमर है तेरी मछली जैसी

हिरनी जैसी तेरी चाल

चूम लूं तेरे माथे को और

मस्तक का अभिषेक करूँ

तू कविता है अंतर्मन की

तेरा क्या उल्लेख करूँ

 

छूट गया जो पीछे छोड़ो

और राह पर बढ़े चलो

हवा के रोके तुम न रुकना

रुख़ बदलो और बढ़े चलो

इक तेरे सपनों की ख़ातिर

धरती अंबर एक करूँ

तू कविता है अंतर्मन की

तेरा क्या उल्लेख करूँ

 

साँसों का बहता दरिया हो

और आँखों का पानी तुम

तुम मेरी अंतिम इच्छा हो

और अपूर्ण कहानी तुम

इक तस्वीर हृदय में तेरी

उसकी देख रेख करूँ

तू कविता है अंतर्मन की

तेरा क्या उल्लेख करूँ

-अमूल्य मिश्रा