ये हिमालय पर्वत मुझसे क्यों हठ करता रहता है। ये बड़ा है ये बार बार क्यों मुझसे कहता रहता है। क्या बड़ा  होना  मापोगे  ऊँचाई  के  मापदंड  से। साँस जीत कर आया हुँ मैं रणभूमि में मृत्युदंड से। कबसे खड़ा हुआ हुँ मैं, तू नित ही घटता जाता है। देख हिमालय नित मेरा ये रूप निखरता जाता है। मेरे समक्ष गर आना है तो शिव शम्भू का ध्यान करो। आँखे  मूंदो  और  अपने  अंदर  का  विषपान  करो।