फ़क़ीर पीर सुख़नवर तेरे मुरीद रहे
ज़हीन लोग तिरे इश्क़ में शहीद रहे
मदद तो ख़ूब की उसने मेरी पर ऐसे की
समझ लो जैसे किसी तोहफ़े पे रसीद रहे
मनाने रूठने के सिलसिलात साथ चलें
सफ़र तवील भी हो धुंध भी शदीद रहे
ये सच है इश्क़ में मिलते हैं जानलेवा दुख
हम ऐसे वाकयों के ख़ुद भी चश्मदीद रहे
तू जाते जाते मेरे दोस्त कुछ तो ऐसा बोल
कि तेरे लौट के आने की कुछ उमीद रहे
-Amulya Mishra
