लफ़्ज़ों में ज़रा एहतराम रखो। चाहे मंसूबा क़त्ल-ए-आम रखो।   और इज़ाज़त है रखने को रखो जितने भी खंज़र मगर शर्त है के मुँह में राम रखो।   और होना क्या है क्या हुआ है अबतक। आप तो बस चर्चा सुबह शाम रखो।   और उड़ाओ मज़े शान से आब-ए-हयात के। गुज़ारिश है ख़ाकसारो के लिए जाम रखो।