फिर से चुनाव की मस्ती में। एक लहर उठी है बस्ती में।   दूर दूर तक नही दीखती है विकास की परछाई। सबने मिल बाँट कर खाई सत्ता की रबड़ी मलाई। नेताजी फिर से खड़े हैं। हाथ को जोड़े पंक्ति में। फिर से चुनाव की मस्ती में। एक लहर उठी है बस्ती में।.....(1)   सबने सेंकी है समय समय पर खूब सियासी रोटियां। न गाय बचा सके गाँव में न शहर में बेटियाँ हिन्दू मुस्लिम का बैर भी है। रोष भी है अभिव्यक्ति में। फिर से चुनाव की मस्ती में। एक लहर उठी है बस्ती में।.....(1)   जनता भोली पूछ रही है। 15 लाख दिलवाओगे। राम लला ख़ुद पूँछ रहे हैं। मंदिर कब बनवाओगे। चेले चपाटे घूम रहे हैं। नेताजी की भक्ति में। फिर से चुनाव की मस्ती में। एक लहर उठी है बस्ती में।.....(1)