जाने कितना डूब चुका हूँ

अंतर्मन की खाई में।

जैसे कोई मोती खोजे 

झीलों की गहराई में।

दुनिया को देखा तो पाया

मैं दुनिया से बढ़कर हुँ।

मानो स्वयं मसीहा हुँ मैं,

मैं ही सबसे ऊपर हुँ।

किंतु एक कीट को देखा

जो शोलों से लड़ता है।

क्षणभर ही जीता हो चाहे

स्वाभिमान से मरता है।

जीवन तो एक मिथ्या है अब

इंसानों की बस्ती में।

लाश पड़ी है स्वाभिमान की

ज़हर भरा अभिव्यक्ति में।

कोई मुझसे बाहर आए

सात समुंदर पार करे।

कैसे भी दरिया को नापे

सपनों को साकार करे।

जाने कितना डूब चुका हूँ.....1

-अमूल्य मिश्रा