सबकुछ जान लेना
सबकुछ कह देना
हमेशा अच्छा नहीं होता
कुछ चीजें समय के साथ
जानी समझनी और पहचानी जानी चाहिए
जब तक रिश्ते की डोर कच्ची है
कुछ बातें अधूरी हीं अच्छी है
जब ये कच्चे धागे की डोर
रेशम की डोर बन जातीहै
तब सबकुछ जान लेना
सबकुछ कह देना
सबकुछ सुन लेना
सारे अहसासों को महसूस करना भी आसान लगता है
उसके पहले मन में न जाने कैसा डर पलता है
और रिश्ता कोई भी हो
सबकुछ कह देना आवश्यक नहीं होता
रिश्तों की गर्माहट बरकरार रखने के लिए
जरूरी है
कम जाना जाए
कम कहा जाए
खामोशियों को पढ़ा जाए
और फिर धीरे-धीरे सबकुछ आसान हो जाता है
पर सबकुछ आसान हो
इसके लिए धैर्य और विश्वास ही एकमात्र विकल्प है
ताकि एक दूसरे को जानने की और जानने की
ईच्छा ताउम्र बनी रहे
फिर रिश्ता और, और मजबूती के साथ मजबूत होता चला जाता है।
