40 poems in 40 days challenge

यादों की रसीद, अब किसी पहर में नहीं कटती, अब ना माएं बाट भेजतीं हैं, ना पाहून घर आते हैं, छतों पर, ना कबूतर पाते हैं, ना मुंडेर पे, कौवें बैठते हैं, ना दरीचें खुलते हैं, और ना किवाड़ों पे दस्तक होते हैं, मन शून्य पड़ा रहता है, हाड़ मांस वाले तन के साथ...

#day 4