कभी कभी अपनी व्यथा सुनाना,
अपनी व्यथा बढ़ाना हो जाता है,
अपने ही हैं रिश्तें सारे,
अपने ही धरे माथे पे हाथ है,
आंखों के तलब में,
कहने को बस,
हां,
बस कहने को,
शारीरिक रूप से साथ हैं,
मानसिक में तो सब खाक है,
तरबियत भी,
रिश्तें भी,
मोह भी,
प्रेम भी,
छल भी,
और द्वेष भी,
हां,
द्वेष भी,
मानसिक में कोई साथ है,
तो वो है,
हृदय,
हां,
बस हृदय,
विशालकाय हृदय,
जिसमें ना जाने कितनी समाहित है,
यादों की समाधियां,
तमन्नाओं के खत,
लोर की बरसात,
और जाने कितनी ही,
तन्हाई की रात...

