40 poems in 40 days challenge
जिंदा,
शब्दों में होते हैं
शब्दों के दरिंदे,
जो शब्दों को बयां नहीं होने देते,
वो,
तोड़ देते हैं,
वर्णों को,
खाली कर देते हैं उनकी इकाई,
तहस नहस हो जाती है,
मात्राएं उनकी,
और,
दो मुंहा हो जातीं हैं,
उनकी सिकाई,
बचे शब्दों की अर्थियों में,
कुछ भी नहीं होता,
ना पर्यायवाची,
ना समानार्थी,
ना समास,
ना काल,
और ना ही कोई काम,
आर्थियां अस्थियों को चली जातीं हैं,
ढोंगियों की सेना आती है,
और,
फिर शुरू होता है,
राग,
गूथने का,
फिर से शब्दों को,
ले आई जाती है पर्यायवाची को,
जिंदा रहते जिसे मीठे बोल ना परोसे गए थे,
मृत्योंपरांत,
बुलाई जाती है सेना समानार्थियों की,
खेली जाती है,
शब्दों की परंपरा,
और गाई जाती है लोरी,
उच्चारणों की,
फिर से बिठाया जाता है,
मात्राओं को,
वर्णों पे,
फिर से चढ़ाई जातीं हैं इकाईयां,
मात्राओं पे,
निकाले जाते हैं,
मतलब,
उसके परोपकार के,
और पापी मन लिए,
भर लिए जाते हैं,
ढोंगी,
कलश को,
उसकी अस्थियों से,
और वापस लिए जातें हैं,
उन्हीं,
जिंदा,
शब्दों के दरिंदे के पास...
#day 40
#challenge completed

