पूर्व-पीठिका
कभी कभी,
शब्द इतने कहे जा चुके होते हैं,
कि वे स्वयं अर्थहीन हो जाते हैं,
वह शब्द,
जो कभी प्रेम था,
अब केवल उच्चारण है,
मैंने बहुत कहा,
बहुत लिखा,
बहुत चिल्लाई भी,
पर अंत में,
सब कुछ निःशब्द में ढह गया,
अब,
मौन ही मेरा संवाद है..

पूर्व-पीठिका
कभी कभी,
शब्द इतने कहे जा चुके होते हैं,
कि वे स्वयं अर्थहीन हो जाते हैं,
वह शब्द,
जो कभी प्रेम था,
अब केवल उच्चारण है,
मैंने बहुत कहा,
बहुत लिखा,
बहुत चिल्लाई भी,
पर अंत में,
सब कुछ निःशब्द में ढह गया,
अब,
मौन ही मेरा संवाद है..