भाग - 2
अहसास हुआ कुछ तलक उसे,
तब तक फैसला किया जा चूका था,
आंसुओं ने तो फिर भी पनाह दी उसे,
पर खर्चो ने,
बेख़ौफ़,बेहिसाब, हिसाब ली उससे,
इस हिसाब की कोई किताब नहीं,
मैंने देखा है मेरे घर में,
फसाद के जड़ों में,
खर्चे के साथ,
मर्द का कोई हिस्सेदार नहीं,
कभी कभी बुझ जाता है वो दीप,
जो कई दियो को,
जलाने के काम आता है,
हट्टा कट्टा दुरुस्त खड़ा वो खम्भा,
कभी कभी ढह जाता है,
जब अहसास में कमी का नाम,
उसकी औरत का आता है,

