भाग-1

कितना बेबस होता है वो मर्द,
जो मर्द कहलाता है,
आँखों में आंसू सजे हो उसके मगर,
कोई आगे पीछे नहीं उसके,
ये सोच के मन घबराता है,
जालीम है दुनिया,
क्यू दुनिया के कटघरे में,
हर बार मर्द ही,
घेरे लगाता है,
हिस्सदारी के टुकड़े हुए,
खुदा के यहाँ तो,
चैन, परवाह, सुकून,सब्र,
सब नसीब हुआ उसे,
पर आँसूओ के कतरो ने,
औरतों का दामन साधा,
और खर्चो ने तो जैसे,
खुद ही जाकर,
मर्द का माथा माँगा.....