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मजहब की ईदी


रौंदे हुए इच्छाओं को,एक बार मुट्ठी में भर लेना है,

पहले खूब रोना है,और फिर आंसू पोंछ लेना है,

अपनी मजहब के विपरीत,ए ईद

इस बार,मुझे भी ईदी मनाना है...

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