40 poems in 40 days challenge
माएं सदियों से भेजती रहीं हैं,
अपनी बेटियों को,
रहने अपने ससुराल,
मांओं ने कभी नहीं भेजा,
स्त्रियों को,
रचने अपने संसार,
स्त्रियां गुठबल संजोए रहतीं हैं,
अल्हड़ अदा की,
पराकाष्ठा की,
परिपक्वता की,
तेज की,
आभा की,
नूर की,
विख्याती की,
सहजता की,
सरलता की,
कोमलता की,
कठोरता की,
यहां तक कि,
पुरुषत्व की भी,
पर अफसोस,
समाज स्त्रियों को स्त्री कहना छोड़ देता है,
वो कहता है उन्हें बस,
बेटी,
बहू,
पत्नी,
प्रेयसी,
और ,
ढेर भर,
लालसा के रिश्तों की ठाठ...
#day 34

