चाहे उम्र के किसी भी ढलान पे हो,

एक अल्हड़ अदा उसमें सदैव रहती है,

देख अपनी हया की सहूलियत,

ठहर जाती है,

क्षण भर को,

उठती है,

हांमी भरती है,

सजती है,

संवरती है,

और कभी कभी तो तोतली बन जाती है,

पर कभी कभी,

बहुत सिसकती है,

उनकी आंखें,

अनंत काल से एक इंतजार में रहीं हैं,

उस घड़ी के इंतजार में,

औरतों के इत्तेफाक वाली घड़ी,

एक इत्तेफाक,

जिसमें सिमटे हैं उनके चाहे,

प्रियतमों से मुलाकात,

एक जहां,

जो परे हो हैवानियत के,

एक इत्तेफाक,

हवाओं के साथ,

अपने

ओढ़नी के सिरे को लपेट,

उड़ जाने का...