40 poems in 40 days challengeकितनी कविताएं रची हैं,चूल्हे पे धीकती,उन हाथों ने,शायद,संख्याओं में,उतने नहीं हो पाते,गर,रह गए होते,सूते मुलायम,कविताओं के जितने शीर्षक,मैंने चावल बिनते धरे हैं,उतने,शायद,मेरी लेखनी नहीं सजा सकती थी...#day 23
40 poems in 40 days challenge
कितनी कविताएं रची हैं,चूल्हे पे धीकती,उन हाथों ने,शायद,संख्याओं में,उतने नहीं हो पाते,गर,रह गए होते,सूते मुलायम,कविताओं के जितने शीर्षक,मैंने चावल बिनते धरे हैं,उतने,शायद,मेरी लेखनी नहीं सजा सकती थी...
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