40 poems in 40 days challenge
मेरा कमरा मेरी कब्र है,
जहां हर रोज का जीना,
और,
हर रोज़ का मरना होता है,
हर रात कयामत होती है,
और हर सुबह रौनक होती है,
छोटा सा कमरा है,
और बड़ी सारी चीजें,
कुछ खुली बिखरी आँखें मिंचे,
जगह जगह गढ़े हैं,
और कोना कोना खाली,
कहीं कलियां मरी पड़ी है,
कहीं स्याहियां दफ़न है,
बिस्तर मरुस्थल बना पड़ा है,
और सिरहाने नुकिले बन,
किसी के सीने से लग,
जान ले ले,
खिड़की दरवाजे सब तंग है,
कोने के ऊपर में लगी,
वो छिद्र,
रोती है मुझे देख के,
कयामत हूं मैं,
और तबहिया मुझे ख़त्म कर देती है,
साफ सुथरे पैरो के,
इतने घायल निसां है,
मजाल है,
झाड़ू के सिंको से,
कभी उनकी बन जाए,
दुआएं दीवारों पे नहीं,
फर्श पर लिखीं हैं,
मेरी आँखें,
निगाहों से,
इतनी डरती है,
कि,
किसी का इंतज़ार,
कोने में बैठ के,
सिसकी लगाए रहती है,
मैं आती हूं तो,
झर-झर नीर बहाने लगती है,
बड़ी वफ़ाये है,
मेरी,
इस कब्र से,
मौका मिले भी तो,
मैं इनसे दूर नहीं जाती,
रौशनी चुपके से,
हर रोज अपने पास बुलाती है,
ख़ूब सारे रिश्तें हैं मेरे,
पर वफ़ादार,
मेरे कमरे सा कोई भी नहीं,
लोगो पे भरोसा नहीं,
अपने कमरे के आबो हवा पे है,
मैं पलके झपकाऊ तो,
धर्ले से पर्दे गिरा,
खामोशी बुला लाती है,
साफ सुथरे मन की,
मैं घिनौनी लड़की,
अपने कमरे को चीखों से सजाती हूं,
हर रोज़ का गुस्सा,
हर रोज की थकान,
रिश्तों का फ़रेब,
और,
भरोसे की हार,
सब अंदर आते हैं उसमें,
और,
बाहर बस,
हसती हुई अमृता जाती है....
#day 24


