40 poems in 40 days challenge
हाट गई थी आज,
संग ले आई कुछ बात,
कुछ भीड़ ले आई,
ले आई कुछ चटपट चाट,
रंग बिरंगे चीजों से,
सजे थे सब घाट,
हमने जाना थोड़ा खुद को ,
हमने पहचाना थोड़ा खुद को,
थोड़ी नमी आँखों में,
लबो पे ले आई कुछ बात,
कुछ मर गये अहसास,
अंदाज़ा होता है अब,
उम्र के दर्द का,
जैसे अभी भी,
पनप रहे कुछ जज़्बात,
मेरे सिरहाने रखी है,
कुछ यादें,
बचपन की,
थक गई मैं अब,
बड़ी बन बन के,
बस छोड़ जाए कोई मुझे,
फ़िर से बचपन में,
मेरे घर की तन्हाइयां चिढ़ातीं हैं,
क्यू नहीं है,
तेरे साथ,
तेरी माँ,
भोजन कभी कम कभी ज्यादे,
माँ क्यू नहीं आ पाया,
मुझे आज तक अंदाज़ा लगाने,
जब जब मैं रोटियां बनाती हूं,
ये गौरैया के बच्चें,
आ आकार तेरी याद दिला देते हैं,
मैं अकेली पड़ जाती हूं मां,
जिसको तूने अपनी बेटी सौंपी,
वो नहीं मानती,
मुझे अपनी बेटी,
बहुत याद आती है तेरी माँ,
याद आती है वो,
आटे की चिड़िया,
जिसको तू तवे पर,
रोटियां सेकते वक्त बनाया करती थी,
पहले मोटू सा पेट,
पेट जैसी गोली,
फ़िर लम्बी सी रंगोली,
रंगोली दी गई फिर मोड़ी,
फिर थोड़ा दबाव,
और,
फिर खींच दिये दो कान,
कान पकड़े फिर तवे पे रख दो,
अंत में फिर पक के,
मेरे पेट में जाती थी,
वो आटे कि चिड़िया,
सजीव हो गयी है माँ,
रोज मेरे इर्द-गिर्द घेरा बना देती है,
तेरी यादों के,
पर,
अब पंख कुतरे हुए हैं इसके माँ,
कैसे रिश्ते हैं ये माँ,
याद आता है बचपन,
याद आती है तेरी माँ,
मैं तो बड़ी हो गई माँ,
अब कहां रो पाती हूं तेरी गोदी में,
कहां सुन पाती हूं वो लोरी,
कहां कह पाती हूं कि,
उदास हूँ,
पर यही सच है माँ,
नहीं आया आज भी मुझे,
रिश्ते संभालना,
तेरी गुड़िया,
आज भी चिड़िया ही है माँ,
वो आटे वाली चिड़िया...
#day 38

