40 poems in 40 days challenge


आंखों में,

कभी सांसें देखी है,

उन सांसों की रफ्तार,

शांत झींगुर के शोर से,

कहीं ज्यादे सन्नाटे रखती है,

जो हवा की झेप से,

ऐसे खुलते बंद होते हैं जैसे,

अपनी अंतिम यात्रा पे हो,

आंखों में जलती,

लाल रंग की रेखाएं,

जाने कितने फूटते ज्वालामुखी के भंवरे को पीछे छोड़ दे,

इस आलम में,

उनके होंठ से निकले शब्द,

ऐसे लगते हैं जैसे,

कोई परिंदा,

अपने पर काट रहा हो,

आसमां में,

उड़ान भरने से पहले...


#day 14