कागज़ पर लिखी

कुछ बातें

कभी लिफ़ाफे में बंद न हुई

दिल की गहराइयों से निकली थी

पर

आवाज़ ज़ुबां तक न आ सकी

कीर्तास हर एक शब्द में थी

एक पुकार

हर मिसरे में छुपा एक दर्द

उस चिट्ठी में थी

बातों से चुन कर छुपाई

कुछ चुनिंदा बातें

रातों से जगाई

कुछ चुनिंदा रातें

हर बार लिखी गई

और हर बार मिटाई गई

पर

वो कभी डाकिये तक जा न सकी

अब भी वो अलमारी में रखी

कहीं धूल से ढकी पड़ी है

अधूरी बातों के वो दस्तावेज़

आज भी दिल की सुनवाई कर रहे हैं

बिना डाकिये तक पहुंचे...