कुछ आपकी कुछ हमारी

हम आपकी, समझ तो समझ लेे।

आपको हमारी समझदारी कौन समझाए,

कौन है जो इतनी ज़हमत उठाए, सच टटोले , स्वीकारे और बतलाए ,

हम आपकी बात तो सुन ले ।

आपको हमारे वचन कौन सुनाए ,

सुनी - सुनाई बातों का ये झूठा विश्वास कौन उठाए ।

हम आपकी ,बोली तो बोल लेे

आपको हमारी ज़ुबान कौन बुलवाए

कौन है ,जो बढ़-बोलो के भंवर से

आपकी नईया पार लगाए ।

हम आपका दिखाया तो देख ले,

आपको हमारा नज़रिया कौन दिखाए

कौन आपके चश्मे बदले ,बदल के चश्मे सही लगाए ।

हम आपके गीत तो गा लेे

आपको हमारे तराने कौन गवाए ,

आप तो सब कुछ जानते भी है

जाने हुए को कौन जनाए।

             ~ अमृता त्रिपाठी