स्त्री हो तुम।

महकती फिजा हो या उधड़े से दामन

ससुराल की देहलीज हो या मायके का आंगन

सिर उठा के जीना

स्त्री हो तुम।

जमाने की निगाहों में , अच्छे बुरे पड़ाव में

दुनियां की रंजिशो में या समय की बंदिशों में

चलना कदम मिला के

स्त्री हो तुम।

रात के अंधेरों में, बुझते सितारों में

ढूंढना तुम खुशियां उम्मीद के उजालों में

फिर बेझिझक चलना,

स्त्री हो तुम

गर्मियों की धूप में, सर्दियों की छावों में

चलते ही जाना उन कठिन सी राहों में

फिर बेहिसाब जीना,

स्त्री हो तुम।


- अमृता

पता - इटावा ( उत्तर - प्रदेश )