थोड़ा तो उसने काट लिया कुछ सफर अभी भी बाकी है।


मरुस्थलीय सी बगिया में, अरमानों के बादल छाए,

उम्मीदों की बिजली कड़की, फिर अड़चन के तूफा आए।

लड़ती है वह अंधियारों से, आशा के दिया और बाती है,

क्या खूब सुना था बचपन में कि, सुख के ही सब साथी है।


नातेदारी सब छूट गई , दादी-बाबा भी छूटे है,

मां की रोटी फिर खायेगी ,अभी सपने पड़े अधूरे हैं।

संग - सखा सब बिछड़ गए, कुछ छूट गए कुछ रूठ गए,

प्रत्यक्षज्ञान सिखाता पग - पग , अनुभव ही उसका साथी है।


अब कहां है चैन - सुकुं उसे , नौका जो उसकी डूब रही,

रातों से लड़ती - फिरती है , संघर्षों से वह जूझ रही।

किस दिन होली कहां दीवाली, हर दिन जैसी राखी है,

अपनी मंजिल को पाने में जीवन जैसे सन्यासी है।


सूखे-सूखे बाग जो उसके, हरे-भरे हो जाएंगे,

जब मंजिल भी मिल जायेगी और अपने भी मिल जायेंगे।

खुशियों के दीप जलेंगे तब, स्नेह की आये दीवाली है,

झूम-झूम के नाचेंगे , फिर घर-आंगन बैसाखी है।


थोड़ा तो उसने काट लिया कुछ सफर अभी भी बाकी है।


                             _अमृता राय