रंजीदा आज ये मधुबन है, किस रोज़ प्रिये तुम आओगे?
भीनीं - भीनीं खुशबू का जब एक झरोखा आता है,
साज - बहारों में सजकर यहां गुलशन भी इठलाता है।
प्रिये क्या गुजरे तुम क्या जानो, यादों से इबादत होती है,
सजदे में जा बैठूं तो भी, अश्कों की बारिश होती है।
थमें - थमें से लम्हें हैं , कुछ बिखरे - बिखरे नगमे हैं,
तुम चुपके से सुनने आओ, जो टूटे - फूटे नगमे हैं।
कितनी घड़ियां गुजर गईं , यहां कितने पहरों बीते हैं
अबकी मास में आओगे इस आस में बरसों बीते हैं।
तदबीर करो ताबीरों को, प्रिये अब ना और विलंब करो,
मैं रूखा सूखा मरू सा हूं, तुम बदरा बन बरसात करो।
तुम हो तो जीवन अभिनव है, हर पर्व ये लगता पावन है,
गुलों में लाखों गुलशन हैं, फिर तीज भी है और सावन है।
रंजीदा आज ये मधुबन है, किस रोज़ प्रिये तुम आओगे?
- अमृता राय
![किस रोज प्रिये तुम आओगे? [ Kis roj priye tum aaoge? ]](/images/post_og.png)

