सवाल ही तो उठ रहे
कि 'आप' पर या आप में?
जो स्तब्ध है अब यहाॅ, तेरा
वो स्वार्थ है या परमार्थ है ?
फिर
रुके जो तुम तो छाॅव है,
चले जो तुम तो ताप है,
जो बढ रहा है यहाॅ, तेरा
वो विराम है या विकास है?
आग ही तो लग रही
कि ध्येय में या देह में?
जो जल रहा यहाॅ तेरा,
वो विश्वास है या श्वांस है?
फिर
उठे जो तुम तो प्राःत है,
झुके जो तुम तो रात है,
जो जग रहा यहाॅ तेरा,
वो स्वप्न है या साध्य है?
तूफां ही तो आ रहे
कि विचार में या आचार में?
जो लङता हवाओं से यहाॅ तेरा,
वो संवाद या खुद से ही शास्त्रार्थ है?
फिर
बुने जो शब्द तो तर्क है,
बिखरे जो तर्क तो हार है,
जो जीत रहा है यहाॅ तेरा,
" कुछ करने " का अहसास है।