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शास्त्रार्थ

सवाल ही तो उठ रहे कि 'आप' पर या आप में? जो स्तब्ध है अब यहाॅ, तेरा वो स्वार्थ है या परमार्थ है ? फिर रुके जो तुम तो छाॅव है, चले जो तुम तो ताप है, जो बढ रहा है यहाॅ, तेरा वो विराम है या विकास है? आग ही तो लग रही कि ध्येय में या देह में? जो जल रहा यहाॅ तेरा, वो विश्वास है या श्वांस है? फिर उठे जो त
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