पाषाणसुता मैं जल जाऊ़गी,
जो तुम निश्चल प्रेम करो।
जनकसुता मैं छल जाऊ़गी,
जो तुम जग परमार्थ करो।
बृजवासिन मैं ढल जाऊ़गी,
जो बन त्रिभंग तुम योग करो।
वेदस्रुता मैं रम जाऊ़गी,
जो तुम नित सत्संग करो।
मैं माया हूंँ, मैं मृगनयनी,
मैं जीवन की दाता हूँ।
मैं बरखा हूँ, मैं हाला हूँ,
मैं भाग्य भोग की भार्या हूँ।
मैं निशब्द प्रेम की मूरत,
मैं सांसों की इच्छा हूँ।
मैं आकुल आँखों की हलचल,
मैं यौवन की व्याकुलता हूँ।
मैं इन्दिरा हूँ अड़ जाऊ़गी,
जो तुम घर में द्रोह करो।
मैं कल्पना हूँ उड़ जाऊ़गी,
जो तुम नभ से नेह करो।
मैं तुलसी हूंँ उग जाऊ़गी,
जो तुम सात्विक कर्म करो।
मैं आशा हूँ समां बन जाऊ़गी,
जो तुम मेरे गीत कहो।
मैं शाश्वत ,प्रेम की डाली,
जो तुम मेरे वृच्छ बनो।
मैं ईश्वर , दुर्गा की वाणी,
जो तुम मेरा ताप करो।
मैं मृदुला मनमोहक मूरत,
तेरे सांचे में ढलती हूँ।
मैं विकृत सहमी सी सूरत,
तेरे पारे से जलती हूँ।
मैं साकार सृष्टि की बेटी,
मैं कण कण में जीवित हूँ।
मैं कोसी, मैं यमुना हूँ,
मैं तेरे कर्मों की कथनी हूँ।
मैं तृष्णा, मैं राखी तेरी,
जैसा देखो मैं वैसी हूँ।
मैं इमारत तेरे चरित्र की,
मैं निर्भया, मैं कैकेयी हूँ।
द्रुपदसुता मैं इक कटाक्छ हूँ,
जो तुम शकुनि चाल चलो।
मनुछबीली मैं लड़ जाऊंगी,
जो तुम जबरन घात करो।
मैं काली हूँ , रक्त पी जाऊ़गी,
जो तुम राक्छस कर्म करो।
मैं नारी हूँ, दासी बन जाऊ़गी,
जो तुम मेरे कृष्ण बनो ।
मैं आवाज हूँ, तुम से कहूँ मैं...... सुन लो जब तक मैं कहती हूँ।
सुन लो .... जब तक..... मैं कहती हूँ.....


