भटकी इस राह में आज एक मुलाकात हो गई , एक श्रमिक मजदूर से - जो कि एक जमाने में बच्चन की आवाज थी , कतार भी उससे ही शुरू होती थी ! पर आज इस कतार में , मैंने आज पूछा और यह जवाब मिला उस मजदूर से ------
“ मेरी जंग “
जो मैंने ही बनाई थी , आज मेरी यह राह, जंग जो बन गई !
सोचा था यह मेरी मंजिल बनेगी ,
पर उल्टे पांव यह मेरी तकदीर ही बन गई
वैसे तो मैं , निर्भर था समाज पर , भगवान ने आज मुझे “आत्मनिर्भर” बना दिया
शायद, चिराग मेरे लिए जलाए थे आपने , पर अंधेरा मेरे दर पर जो आ गया ;
अरे मेरे समझदारो, ऐसा क्या ज्यादा मांगा आपसे,
‘भिकमंगा’ करार जो दिया
मित्रों , आज मेरी यह राह, जंग जो बन गई !
मुझे मालूम ही नहीं था,
‘वंदे मातरम’ हवाई सफर में ही गाया जाता है,
सफर की यह दुनिया तोलमोल की भी होती है ,
हवाई जूतों की गारंटी , अब तो सातसौ मैल की जो हो गई !!
खींचते-खींचते, उसने मुझे ही पूछा और कितनी मंजिल है बाकी ?
सब इस वक्त ही काटनी है, क्या इस पेट के लिए रखूं कुछ खाली !!
मित्रों , आज मेरी यह राह, जंग जो बन गई
ऊंचे तुम्हारे ख्वाब , मैंने जो खड़े किए, नीचे उसके आज , उम्मीद की दुनिया मेरी भारी ,
पता ही नहीं चला बनवासी मैं कब हो गया !
मित्रों, तुम तो हर दिन - रामजी के वनवास में रो दिए
आज मेरी यह राह, जंग जो बन गई !
जब ये छूत पचास की थी, तो मैं बंधा था और आज ये लाखों के करीब, तो मैं आजाद कर दिया
छूत-अछूत कि ये बीमार रिश्तेदारी, निभाते - निभाते
किसका अपना, किसको पराया , अभी भी सीमा के दायरे पर ही खड़ !
मित्रों , आज मेरी यह राह, जंग जो बन गई
मजबूर ये हालात , इधर भी -उधर भी,
खाली हाथ, पेट आधा, पाँव छिले, जेब खाली
फिर भी उम्मीद की, मजबूर ये नजरें फितूर जो हो गई , तुम्हारी वादों पर
लगा गुलजारे-बहारें फिरसे खिलेगी,
फिरसे चवन्नी , मेरी जेब खोजेगी ,
उम्मीद की यह सोच , फिरसे जुमला
तो नहीं बन जाएगी !!
मित्रों इसलिए, आज ये जंग जो बन गई !
वरना , हे भगवान
कल आईना लेकर मेरा एक हमशक्ल , तुम्हारे दर पर फिरसे आएगा ,
भूल मत जाना उसको भी !
आज बचेंगे तो और भी लड़ेंगे
मित्रों, इसके बाद भी जिंदा तो रहेंगे
बिल्कुल खड़े भी रहेंगे , उस आने वाली कतारों में !
उस वक्त रहेगा , हमारा डंका जो
उंगली को शाई लगाकर, प्यास हम बुझायेंगे
कल जो हमारा है , बदलेंगे मुट्ठी की ताकत से
आहट जो कदमों की , ललकारी जो गूंजेगी
हे भगवान , तू भी बोलेगा उस दिन
“ मजदूर भाई जिंदाबाद “


