खाली वक्त में, जब आगे - पीछे की सोच होती है - तो कई सारे सवाल उठते हैं और एक कलम ही है जो अपनी रंजिश से कागज पर लिख देती है यह कविता –
“कलम”
ख्वाहिशे तो , हजारों रखी थी,
कुछ सीखने की उम्मीद भी थी ,
पर क्या करें, पढ़ाई बीच में आ गई ll
वरना हौसले तो, बहुत बुलंद थे
कुछ करने की , उमंग भी थी,
पर क्या करें, मधुशाला जो मिलने आ गई ll
राह चुनी हुई थी, मंजिलें भी करीब थी,
खुदा और आसमान, साथ में ही था ,
पर क्या करें, राहों में तू जो मिल गई ll
नहीं तो, मैं कब का आजाद पंछी था ,
खुशहाल जिंदगी में, मशगूल हो गया था ,
पर क्या करें, मौत तू जो मिलने को आ गई ll
इसलिए ख्वाहिश, तो हजारों रखी थी ,
पर क्या करें लिखते - लिखते ,
कलम की शाही जो खत्म हो गई ll
शुक्रिया !!
अमोल-37


