कुछ न सोचने के अलावा
न जाने क्या क्या सोचा करता हूँ
कभी कभी यादों से इतर
ख़ुद को भी टोका करता हूँ
गुजरता हूँ ख़्वाबों के शहर से
तो ख़ुद से ही धोखा करता हूँ
कभी दिल को समझाता हूँ यहाँ
कभी ख़ुद को ही रोका करता हूँ
जब सब कुछ भूलने के बाद
आँखों में नमीं रह जाती है मेरी
मुड़कर देखता हूँ तुमको
फिर घर को देखा करता हूँ


