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ख़्वाब और बेरोजगार


आँखों में ख़्वाब फूट रहे हैं सोया कैसे जाए

हाथों में रूमाल नहीं है रोया कैसे जाए

एक हक़ीकत है ये कि हम इस काबिल तो हैं

पर ये नाक़ाबीलियत का दाग धोया कैसे जाए

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