शब ए फुरकत किसी को यूं भी नसीब ना हो,
कि सनम हो दिल में और वो मेरे करीब ना हो,
माना कि फासलों से मोहब्बत कम नहीं होती,
मगर ये दूरियां भी इश्क़ की तहज़ीब ना हो,
ज़ख्म लगते हैं रूह पर शब ए फ़िराक़ से,
कोई दीवाना इतना भी बदनसीब ना हो,
किसी की मोहब्बत होना किसी दौलत से कम नहीं,
वस्ल से महरूम मुझ सा कोई गरीब ना हो,
हर घड़ी एक मौत है हिज्र की रातों में,
इश्क़ में हालात ऐसे भी अजीब ना हो,
बेशुमार दर्द और रुसवाईयां ही लिखे,
उल्फत के किस्सों का ऐसा भी अदीब ना हो।
अमित उमर
