इश्क़ में सनम को खुदा मान लिया हमने सनम सबसे है जुदा, जान लिया हमने हमने पाया इबादत में उन्ही का चेहरा सफ़र का रास्ता अब आके उन्ही पर ठहरा उनके आगोश को मैंने खुदा का घर समझा इश्क़ की तिशनगी में ना हिज़्र का डर समझा सनम है अब्र सा मैं हूँ उस्सी की बारिशें उसके नाम पर है इश्क़ की सब सादिशे वो है क़ाबा, तो मैं हूँ सफिरने हरम वो है मौला,तो मुझपे ही हो उसका करम उसके तस्सवुर में दिन से रात होती है खुदा के घर में भी उनसे मुलाकात होती है ज़ुबान पर हर उसकी मुख़्तसर बात होती है ख्यालों में वो साथ"असीम"हर रात होती है