घर से बे घर कर गई करवटें नसीब की
और दूर यितनी हो गई मंजिले करीब की
रफ्ता रफ्ता हो गई दिल में कितनी दूरियां
कल मोहब्बत थी जिस से आज है
मजबूरिया तम्माना थी की गुलसन से बहार देखेंगे अपने ही आखों से अपने का प्यार देखेंगे
मुझे नही मालूम था मेरे मालिक की अपने ही घर में गदर देखेंगे