
बीती रात वो कुछ इस तरह हमें बरगलाते रहे तलब थी खट्टे आम की वो अंगूर खिलाते रहे
हसरतें थी उन्हें सारी रात जगाये रखने की वो साँझ ढले से जुल्फों की छाँव में सुलाते रहे
नग़मे इश्क़ के याद किये सारे उनकी ख़ातिर एक वो थे जो हमें बस लोरियाँ सुनाते रहे
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