जब से हमें अपने परायों की पहचान हो गयी
तन्हा ही रहता हूँ  पूरी दुनिया  वीरान हो गयी
 
हँसी के ठहाके गूँजा करते थे  जिन गलियों में
अब हाल यूँ  की सारी सड़कें सुनसान हो गयी
 
दिल की सुन उस ओर चल दिया करते थे कदम
ठोकरें जो लगी  तो  रूह से भी पहचान हो गयी
 
ख्वाहिशों का बचपना भी चंचल ना रहा अब
उम्मीदों की हकीकत  कुछ यूँ जवान हो गयी
 
बिन झरोखों के उजाले की  आस रखूँ कैसे
वो टूटी झोपड़ी मेरी पक्का  मकान हो गयी
 
'मौन' रहकर अब  जज्बातों की स्याही  बनाता  हूँ
हाल-ए-दिल खुद लिखती है कलम महान हो गयी