आँखें जो खुली तो उन्हें अपने क़रीब पाया ना था
कभी थे रूह में शामिल आज उनका साया ना था

बेपनाह मोहब्बत की जिनसे  उम्मीदें लिये बैठे थे
उनसे तन्हाइयों की सौगातें मिलेंगी बताया ना था

एक हम ही कसीदे हुस्न के  हर बार  पढ़ते रहे
पर उसने तो कभी हाल-ए-दिल सुनाया ना था
 
वो फिरते रहे दिल में  ना जाने कितने  राज लिये
हमने तो कभी उनसे जज्बातों को छुपाया ना था
 
जाने क्यों हम  बेवजह  मदहोश  हुआ करते थे
जाम आँखों से तो  कभी उसने  पिलाया ना था
 
मीलों  कब्ज़ा कर  बना रखा था  सपनों का महल 
पर उसने वो ख़्वाब कभी आँखों में सजाया ना था
 
धड़कन  'मौन'  हुई  अब  एक  आह  की  आवाज़  है
शिकवा क्या उनसे जिसने कभी अपना बनाया ना था