हे राष्ट्र ऋषि, हे महर्षि, हे योगऋषि, हे ब्रह्मर्शी हे शिवभक्त ,हे रामभक्त, हे पुरूषोत्तम, हे चक्रवर्ती..। हे अवतारी ईश्वर के ,तुम ही धर्म के पोषक हो। तुम वरद पुत्र हो ईश्वर के,तुम चर , तुम ही अचर ,तुम ही सनातन के द्योतक हो।। पर प्रभु मेरे दयालुताया थोड़ा सा इस देश पर उपकार करो जो कट रहे है सर जवानो के ,उस पर थोड़ा विचार करो।। मत लो परीक्षा धीरज की, ना बाँधो शेर को बेड़ियों से। दिखाओ पैमाना अपनी छाती की,हो जाने दो दो हाथ ना "पाक" भेड़ियों से।। प्रभु आप ख़ूब निभाओ मित्रता गाढ़ी,उपहार भी प्रदान करो। पर थोड़ा डिगो अपनी बातों पर, बलिदानी वीरों पर भी थोड़ा गुमान करो।। हे गंगा के पुत्र भीष्म से, हे सेवक, हे फ़क़ीर, हे पुत्र दत्तक। मनोबल टूट रहा है वीरों का, कब लाओगे, मस्तक के बदले दस मस्तक ।।