हर साल जब फूटती है
धान की बालियाँ
बरसते है जम के बादल
उस बिलबिलाती
गंदी नालियों, पगडंडियों
और खेतों से
से निकलता है एक तूफ़ानी तपन
हज़ारों नौनिहाल जूझते हैं
हर साल इस दिमाग़ पे
चढ़े बुखार से
कुछ लड़ते हैं कुछ हार जातें हैं
सरकारी ख़ज़ाने से भी
निकलते हैं करोड़ों
कुछ ख़र्च होते हैं इस लड़ाई में
कुछ चुपके से उस पार जाते हैं
इस साल भी वही सिलसिला
चल रहा था जूझने का ,लड़ने का
जितने का और पार करने का
अचानक रोक दी गयी
साँस
बुझा दी गयी थोड़ी बहुत
बची आस
फिर सिलसिला शुरू हुआ
झूठ का ,सच का
कमेटियों का ,जाँच का
क्यूँ कोई सवाल नहीं उठता
है तुम्हारी नियत पर
दशकों से की गयी तुम्हारी
तथाकथित कोशिशों पर
और बूछ गए हैं चिराग़ जिस घर के
उन लाखों बदकिस्मतो पर...।