वो घिसी हुयी चप्पल

और धोती घुटने तक 

फफक रहा था ,

बस स्टैंड पर

हाथ में लेकर 

चादर में लिपटा 

इक बुत

इक पत्थर,

निर्जीव पड़ा वो 

आने वाला कल..।।

सुना था हवा 

बिना मोल मिलती है

ये शहर वाले कह रहे थे,

कि हवा का पैसा नहीं 

चुकाया गया है

पर उसने अदा की है 

पैसा ना चुकाने की 

क़ीमत 

पिछली बार सूखे में

और इस बार बरसात में..।।

कल  लाया था

वो चार पहियों की 

साइकल ,जब

चुकाये थे दाम आढ़तिये ने

काटकर अपना मूल

और ब्याज..।।

इस बार तो बादल ख़ूब

बरसे,इतना तो तब भी

नहीं बरसे जब मूल 

डूबा था सूखे खेत में..।।

सोचता है घर जाये

या ना जाए ये पत्थर लेकर....

जब भी कुछ छूटता है 

इतना सख़्त क्यूँ हो 

जाता है..??

खेत या ये आने वाला कल ..।।

  #Amit Tripathi #Gorakhpur