दिल के किसी कोने में घात लगाए बैठी थी
उम्र के इस पड़ाव पर निकळी
बसंत का एहसास करा गयी
जो भूल चुकी थी मैं वो ख्वाब जगा गयी
कभी माँ की लोरी बन निकळी
कभी बच्चों के लिए आशीर्वाद
कभी प्रियतम की अखियों में समायी
तो कभी निंदिया बन
मेरे ख्वाबों में छायी
कभी ग़मों का मिटाया अन्धेरा
कभी दे गयी खुशियों का सवेरा
कभी बचपन की गलियों में जाकर
अठखेलियाँ सी कर आती है
कभी अल्हढ़ जवानी की मदहोशी बन
मेरे मन को गुदगुदाती है
कभी बारिश की फुहारों में नाचती है
तो कभी तपती धुप सी चुभती है
दबी थी जो दिल के किसी कोने में
वही कविता
आज धरा के कण कण में दिखती है
मन में खुशियों की तरंगों संग
बजने लगे हैं साज
मेरी कविता
आज बन गयी है
मेरे दिल की आवाज़