गणतन्त्र से भीड़ तन्त्र तक की यात्रा


७१ साल से. घिसटते घिसटते

हमारा गणतन्त्र कहीं रास्ता भटक गया है

जनमत का.फैसला चुनावी नारा हो गया है

जैसे बेटी बचाओ

सर्वधर्म सम्भाव आज सेकुलर नाम की गाली बन गया है

युवावस्था में वामपंथी होना एक आदर्श था

अब उन्हें अर्बन नक्सल कहा जाता है

महात्मा गोडसे का महिमामंडन करनेवाले

मोहनदास कर्मचन्द गांधी की १५० वीं

शताब्दी मना रहे हैं

प्रचंडतम देश भक्त चैनल वाले

आतंकवादी हमलों का जश्न मना रहे हैं

जो देश कभी फूलों का गुलदस्ता था

वहाँ अब एक ही फूल खिलता है

जो कीचड़ में उगता है

सबसे कमजोर व्यक्ति की मदद करनेवाला

लोकतंत्र अब जिसकी लाठी उसकी भैंस का पर्याय बन गया है

आज के नौनिहालों को ये कौन समझायेगा

किसमें है इतनी हिम्मत और हिमाकत?

गणतंत्र अब बूढा हो गया है।