करोना की दोस्ती 


मेरी और इस कबूतरी में अब मूक सहमति हो चुकी है 

करोना से पहले 

अगर वो बाल्कनी की जाली के अंदर आने की गुस्ताखी करती थी 

तो मैं ग़ुस्से में उसके आने जाने के रास्ते बन्द करने लगता था

यह फ़रवरी की बात है और हम रोज़ 

'मेरा घर' 'तेरा घर' खेलते रहते थे।


फ़रवरी में मैं मुम्बई गया 

और फिर करोना आ गया

मैं छः महीने बाद वापस घर आया 

हालात बदल चुके थे।


वो कबूतरी अब बाल बच्चेदार हो चुकी थी 

अब मेरा घर और उसका घर साझा घर था 

उसके बच्चे मेरी बाल्कनी में पल रहे थे

उन्हें इस हालात में धक्के देकर निकालना

तो पक्षी अधिकार का घोर उल्लंघन होता।


अब वो रोज़ जब चाहे अंदर आती है

अपने बच्चों को खाना देती है

और रात को उनके साथ सोती है।


सुबह मेरे दरवाज़ा खोलते ही 

वो निडर होकर बाहर आती है

मुझे एक प्यार भारी नज़र से देख कर

एक अलसाई हुई अंगड़ाई लेती है

और चुपचाप अपने बनाए हुए गुप्त रास्ते से 

मुक्त आकाश में विचरण करने निकल जाती है।


और मैं 

अपने ही घर में 

क़ैदियों की तरह जीने को मजबूर

क्योंकि मेरे घर में रहने से करोना आगे नहीं बढ़ेगा

ऐसा सरकार ने समझाया है।


और अपनी चुनी हुई

पूर्ण बहुमत वाली सरकार

कभी हमसे झूठ थोड़े बोलेगी।