अनन्य धन्य हो गई लगती

पाटलिपुत्र की धरती, क्योंकि

अब नहीं है कमी यहां चाणक्यों की


गली-गली अटे और पड़े मिलेंगे,

गर्जन करते आडंबर के शौर्य

लेकिन क्या कहीं कोई दिखता जिसे 

बतला सको तुम चंद्रगुप्त मौर्य?


अपने कलिंग से लथपथ लौटा अशोक भी

अंतस में बचा-खुचा कुम्हरार है

अतुलित नगर सभ्यता के नीचे दबा ये

पाटलिग्राम उदयिन को अब 

अस्वीकार्य है


  छद्म अजातशत्रु बन घूमते घणानंद

लिच्छवी को बार-बार उजाड़ते हैं

और प्रथम गणतंत्र के गण छले

औ’ बस कराहते हर बार रह जाते हैं


काल की कोठरी में ज़ब्त सुत मोहित 

वर्तमान बिम्बिसार और बिन्दुसार

स्वेद नहीं, हैं स्वरक्त पोषक 

अतीत का ये नालंदा खंडहर में तब्दील

किंचित मात्र नहीं रहा भविष्य का द्योतक


बुद्ध ने कहा था जाते समय, बचाना

अपने पाटलिपुत्र को आग और पानी से

बचा रहा सावधान रह अप्रतिम साम्राज्य

नहीं बचा रहा लेकिन लोकतंत्र में शाही

आघातों से

~Himwan